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स्व.नीरज जी को सादर नमन

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मुझे तो यह वीडियो सुन कर बहुत आनंद आ गया अगर आपको भी आनंद नहीं आए तो उसकी गारंटी मैं लेता हूं

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आजकल सांप पिटारे में नहीं रहते-राहत इन्दौरी

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त्रिवेणी 3 पंक्तियों पर आधारित एक विशिष्ट काव्य विधा हैI त्रिवेणी का आविष्कार गुलज़ार ने कियाI त्रिवेणी की पहली दोनों पंक्तियाँ अपना पूर्ण अर्थ रखती हैं, एक मुकम्मल शे’र की तरह और तीसरी पंक्ति जुड़ने से अर्थ परिवर्तन हो जाता है या अर्थ में कोई नया अर्थ जुड़ जाता हैI यह तीसरी पंक्ति एक कमेंट की तरह से काम करती हैI 

इसके बारे में गुलज़ार लिखते हैं- 
त्रिवेणी न तो मुसल्लस है, न हाइकू, न तीन मिसरों में कही एक नज्‍़म। इन तीनों ‘फ़ार्म्ज़’में एक ख्‍़याल और एक इमेज का तसलसुल (सिलसिला, संबंध) मिलता है। लेकिन त्रिवेणी का फ़र्क़ इसके मिज़ाज का फ़र्क़ है। तीसरा मिसरा पहले दो मिसरों के मफ़हूम (अर्थ) को कभी निखार देता है,कभी इज़ाफ़ा करता है या उन पर ‘कमेंट’ करता है। त्रिवेणी नाम इस लिये दिया गया था कि संगम पर तीन नदियां मिलती हैं। गंगा ,जमना और सरस्वती। गंगा और जमना के धारे सतह पर नज़र आते हैं लेकिन सरस्वती जो तक्षिला (तक्षशिला) के रास्ते बह कर आती थी, वह ज़मींदोज़ (विलुप्त) हो चुकी है। त्रिवेणी के तीसरे मिसरे का काम सरस्वती दिखाना है जो पहले दो मिसरों में छुपी हुई है।"

“सामने आये मेरे,देखा मुझे,बात भी की
मुस्कराए भी,पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर

कल का अख़बार था,बस देख लिया,रख भी दिया।”

“तुम्हारे होंठ बहुत खु़श्क खु़श्क रहते हैं
इन्हीं लबों पे कभी ताज़ा शे’र मिलते थे

ये तुमने होंठों पे अफ़साने रख लिये कब से?”

तो आइये हम भी त्रिवेणी लिखते हैंI

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यदि आप YQ Sahitya फॉलो नहीं करते तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं। 
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अनुस्वार का प्रयोग पंचम वर्ण (  ङ्, ञ़्, ण्, न्, म् ) के लिए किया जाता है।

गंगा (गड्.गा), चंचल (चञ़्चल), मुंडन (मुण्डन), संबंध (सम्बन्ध) आदि शब्दों में हम देखते हैं कि जिस जगह अनुस्वार का प्रयोग किया जा रहा है उसके स्थान पर पंचम-वर्ण अलग-अलग आ रहे हैं। इसका कारण यह नियम है -

नियम - अनुस्वार के चिह्न के प्रयोग के बाद आने वाला वर्ण ‘क’ वर्ग, ’च’ वर्ग, ‘ट’ वर्ग, ‘त’ वर्ग और ‘प’ वर्ग में से जिस वर्ग से संबंधित होता है अनुस्वार उसी वर्ग के पंचम-वर्ण के लिए प्रयुक्त होता है।

1.  यदि पंचमाक्षर के बाद किसी अन्य वर्ग का कोई वर्ण आए तो पंचमाक्षर अनुस्वार के रूप  में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे- वाड्.मय, अन्य, चिन्मय, उन्मुख आदि शब्द वांमय, अंय, चिंमय, उंमुख के रूप में  नहीं लिखे जाते हैं।
2.  पंचम वर्ण यदि द्वित्व रूप में दुबारा आये तो पंचम वर्ण अनुस्वार में परिवर्तित नहीं होगा। जैसे प्रसन्न, अन्न, सम्मेलन आदि के प्रसंन, अंन, संमेलन रूप नहीं लिखे जाते हैं।

3.  संयुक्त वर्ण दो व्यंजनों से मिलकर बनता है जैसे त् + र - त्र, ज् + ञ़ - ज्ञ इसलिए अनुस्वार के बाद संयुक्त वर्ण आने पर संयुक्त वर्ण जिन वर्णों से मिलकर बना है उनका पहला वर्ण जिस वर्ग से जुड़ा है अनुस्वार उसी वर्ग के पंचम-वर्ण के लिए प्रयुक्त होता है।

उदाहरण एक:-

मंत्र शब्द में है म + अनुस्वार + त्र   
यह त्र संयुक्ताक्षर है जो बना है त् + र से।अनुस्वार के बाद आया है - त् 
त् जिस वर्ग का है उसका पंचम वर्ण हुआ न्
इसलिए अनुस्वार न् के उच्चारण के लिए कार्य कर रहा है।

उदाहरण दो:-

संक्रमण शब्द में है
स + अनुस्वार + क्र + म + ण   
यह क्र संयुक्ताक्षर है जो बना है क् + र से
अनुस्वार के बाद आया है - क्
क् जिस वर्ग का है उसका पंचम वर्ण हुआ ड्.
इसलिए अनुस्वार ड्. के उच्चारण के लिए कार्य कर रहा है।

4. अनुस्वार के प्रयोग में व्यंजन संधि का ‘म्’ से संबंधित यह नियम भी ध्यान रखना चाहिए -

नियम - यदि किसी शब्द में म् के बाद क् से भ् तक कोई भी व्यंजन आता है तो ‘म्’ उस व्यंजन के पंचम वर्ण में परिवर्तित हो जाता है।
विशेष :- ऐसे में शब्द की वर्ण व्यवस्था पर भी ध्यान दें

जैसे -

उदाहरण एक:-

संग्राम शब्द में है
सम् +ग्राम
यह ग्र संयुक्ताक्षर है जो बना है ग् + र से
म् के बाद आया है - ग्
ग् जिस वर्ग का है उसका पंचम वर्ण हुआ 'ड्.'
इसलिए अनुस्वार 'ड्.' के उच्चारण के लिए कार्य कर रहा है।
इसलिए यहाँ व्यंजन संधि के नियम के अनुसार ‘म्’ ही ‘ड्.’ में परिवर्तित हुआ है।

उदाहरण दो :-

संजय शब्द में है
सम् + जय
यहाँ 'म्' के बाद आया है - 'ज्'
'ज्' जिस वर्ग का है उसका पंचम वर्ण हुआ 'ञ़्'
इसलिए अनुस्वार ‘ञ़्’ के उच्चारण के लिए कार्य कर रहा है।

इसलिए यहाँ व्यंजन संधि के नियम के अनुसार ‘म्’ ही ‘ञ़्’ में परिवर्तित हुआ है।

5. म् के बाद य, र, ल, व, ह, श, ष, स होने पर म् अनुस्वार में परिवर्तित हो जाता है । या इसे समझने के लिए यों कहें तो अधिक सरल होगा कि अनुस्वार के बाद य, र, ल, व, ह, श, ष, स होने पर यह अनुस्वार ‘म्’ को इंगित करता है।

उदाहरण एक:-

संरक्षक शब्द में है
सम् + रक्षक
यहाँ अुनस्वार के बाद आया है - 'र'
इसलिए यहाँ व्यंजन संधि के नियम के अनुसार अनुस्वार ‘म्’ के लिए आया है।

उदाहरण दो:-

संशय शब्द में है
सम् + शय
यहाँ अुनस्वार के बाद आया है - 'श'
इसलिए यहाँ व्यंजन संधि के नियम के अनुसार  अनुस्वार ‘म्’ के लिए आया है।

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जन्मदिवस 30जून1911 मधुबनी बिहार में जन्मे बाबा नागार्जुन पर विषेश

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