Dr. Nirmal Mehta

Smriti Nagar

अमृता प्रीतम जी की दिल छू लेने वाली एक रचना...




अपने पूरे होश-ओ-हवास में
लिख रही हूँ आज... मैं
वसीयत ..अपनी
मेरे मरने के बाद
खंगालना.. मेरा कमरा
टटोलना.. हर एक चीज़
घर भर में ..बिन ताले के
मेरा सामान.. बिखरा पड़ा है

दे देना... मेरे खवाब
उन तमाम.. स्त्रियों को
जो किचेन से बेडरूम
तक सिमट गयी ..अपनी दुनिया में
गुम गयी हैं
वे भूल चुकी हैं सालों पहले
खवाब देखना

बाँट देना.. मेरे ठहाके
वृद्धाश्रम के.. उन बूढों में
जिनके बच्चे
अमरीका के जगमगाते शहरों में
लापता हो गए हैं

टेबल पर.. मेरे देखना
कुछ रंग पड़े होंगे
इस रंग से ..रंग देना उस बेवा की साड़ी
जिसके आदमी के खून से
बोर्डर... रंगा हुआ है
तिरंगे में लिपटकर
वो कल शाम सो गया है

आंसू मेरे दे देना
तमाम शायरों को
हर बूँद से
होगी ग़ज़ल पैदा
मेरा वादा है

मेरा मान , मेरी आबरु
उस वैश्या के नाम है
बेचती है जिस्म जो
बेटी को पढ़ाने के लिए

इस देश के एक-एक युवक को
पकड़ के
लगा देना इंजेक्शन
मेरे आक्रोश का
पड़ेगी इसकी ज़रुरत
क्रांति के दिन उन्हें

दीवानगी मेरी
हिस्से में है
उस सूफी के
निकला है जो
सब छोड़कर
खुदा की तलाश में

बस !
बाक़ी बची
मेरी ईर्ष्या
मेरा लालच
मेरा क्रोध
मेरा झूठ
मेरा स्वार्थ
तो
ऐसा करना
उन्हें मेरे संग ही जला देना...

Suryakant Nagar

यह एहतराम तो करना ज़रूर पड़ता है
जो तू ख़रीदे तो बिकना ज़रूर पड़ता है

बड़े सलीक़े से यह कह के ज़िन्दगी गुज़री
हर एक शख़्स को मरना ज़रूर पड़ता है

वो दोस्ती हो मुहब्बत हो चाहे सोना हो
कसौटियों पे परखना ज़रूर पड़ता है

कभी जवानी से पहले कभी बुढ़ापे में
ख़ुदा के सामने झुकना ज़रूर पड़ता है

हो चाहे जितनी पुरानी भी दुश्मनी लेकिन
कोई पुकारे तो रुकना ज़रूर पड़ता है

शराब पी के बहकने से कौन रोकेगा
शराब पी के बहकना ज़रूर पड़ता है

वफ़ा की राह पे चलिए मगर ये ध्यान रहे
कि दरमियान में सहरा ज़रूर पड़ता है

मुनव्वर राना

Dr. Nirmal Mehta

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Dr. Nirmal Mehta

Suryakant Nagar

" सूर छिपे अदरी-बदरी,अरु चंद्र छिपे अमावस आये,
  पानी की बूँद पतंग छिपे,अरु मीन छिपे इच्छा जल पाये;
  भोर भये पर चोर छिपे,अरु मोर छिपे ऋतु फागुन आये,-
  ओट करो सत घूँघट की,पै चंचल नैन छिपे न छिपाये ।"
                                          - राजा बीरबल
(श्री राधारमण त्रिपाठी जी के
संकलन से साभार)

Manraas

*💙 समय चला, पर कैसे चला... 💙*
            *पता ही नहीं चला...*

      
ज़िन्दगी की आपाधापी में,
कब निकली उम्र हमारी,यारो
*पता ही नहीं चला।*

कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे,
कब कंधे तक आ गए,
*पता ही नहीं चला।*

किराये के घर से
शुरू हुआ था सफर अपना
कब अपने घर तक आ गए,
*पता ही नहीं चला।*

साइकिल के
पैडल मारते हुए,
हांफते थे उस वक़्त,
कब से हम,
कारों में घूमने लगे हैं,
*पता ही नहीं चला।*

कभी थे जिम्मेदारी
हम माँ बाप की ,
कब बच्चों के लिए
हुए जिम्मेदार हम,
*पता ही नहीं चला।*

एक दौर था जब
दिन में भी बेखबर सो जाते थे,
कब रातों की उड़ गई नींद,
*पता ही नहीं चला।*

जिन काले घने
बालों पर इतराते थे कभी हम,
कब सफेद होना शुरू कर दिया,
*पता ही नहीं चला।*

दर दर भटके थे,
नौकरी की खातिर ,
कब रिटायर होने का समय आ गया
*पता ही नहीं चला।*

बच्चों के लिए
कमाने, बचाने में
इतने मशगूल हुए हम,
कब बच्चे हमसे हुए दूर,
*पता ही नहीं चला।*

भरे पूरे परिवार से
सीना चौड़ा रखते थे हम,
कब परिवार हमी दो पर सिमट गया।
*।।। पता ही नहीं चला ।।।*.

Manraas

आज मौसम कितना खुश गंवार हो गया
खत्म सभी का इंतज़ार हो गया
बारिश की बूंदे गिरी कुछ इस तरह से
लगा जैसे आसमान को ज़मीन से प्यार हो गया...
 
कल तक उड़ती थी चेहरे पर
आज पैरों से लिपट गयी
चन्द बूँदें क्या बरसीं बरसात की
धूल की फ़ितरत ही बदल गयी

Dr. Nirmal Mehta

Smriti Nagar

ये औरतें भी न!


दो मिनट की आरामदायक और 
बच्चों के पसंद की ज़ायकेदार मैगी को छोड़, 
किचन में गर्मी में तप कर 
हरी सब्ज़ियाँ बनाती फिरती हैं।
बच्चे मुँह बिचकाकर 
नाराज़गी दिखलाते हैं सो अलग,
फिर भी बाज नहीं आती।

! ये औरतें भी न, 

जब किसी बात पे दिल दुखे ,
तो घर मे अकेले में आँसुओं 
की झड़ी लगा देगी।
लेकिन बाहर अपनी सहेलियों के 
सामने तो ऐसे मुस्कुरायेगी,
जैसे उसके जितना 
सुखी कोई नहीं।

! ये औरतें भी न,

जब कभी लड़ लेगी पति से,
तो सोच लेगी अब मुझे 
तुमसे कोई मतलब नहीं।
लेकिन शाम में जब घर आने में 
पति महाशय को देर हो जाये,
तो घड़ी पे टक-टकी 
लगाए रहेगी।
और बच्चों से बोलेगी,
"फोन कर के पापा से पूछो 
आये क्यों नहीं अभी तक?"

अरे यार! ये औरतें भी न,

तिनका तिनका जोड़कर 
अपने आशियाने को बनाती 
और सजाती हैं,
चलती और ढलती रहती 
है सबके अनुसार।
लेकिन कभी एक कदम भी 
बढ़ा ले अपने अनुसार,
तो "यहाँ ऐसे नहीं चलेगा
जाओ अपने घर (मायका)
ये सब वहीं करना।"
सुन रो रोकर 
सोचती रहती है,
अब मैं इस घर में नहीं रहूँगी।
रात भर आँसुओं से 
तकिया गीला कर,
उल्लू की तरह 
आँखें सूजा लेती हैं।
अगले दिन फिर से 
सुबह उठकर
तैयार करने लगती है,
बच्चों की टिफिन और 
सबके के लिए नाश्ता।
बदलने लगती है 
ड्राइंग रूम के कुशन कवर, 
और फिर से सींचने लगती है
अपने लगाए पौधों को।
सच में एकदम पागल है!
सोचती कुछ है और 
करती कुछ!

 ये औरतें भी न, 
✍✍

Smriti Nagar

फुरसत अगर मिले तो मुझे पढना जरूर ...... मैं नायाब ऊलझनो की मुकम्मल किताब हूँ.